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Matar Ki Kheti:मटर की खेती कैसे करें

जानिए मटर की खेती से कैसे एक सीजन में कमाएं 3.50 लाख तक का मुनाफा

आधुनिककाल से मटर का प्रयोग हरी सब्जी के लिए तथा सूखे दानों का प्रयोग दाल के लिए किया जाता रहा है। दिन प्रति दिन मटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है

मटर ठंडे मौसम की फसल है जो महाराष्ट्र में व्यापक रूप से उगाई जाती है मटर का उपयोग आहार में दाल व सब्जी के रूप में किया जाता है. जिसकी अगेती खेती करके आप अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं.

दलहनी फसलों में भी मटर का एक महत्वपूर्ण स्थान है। मटर की खेती से कम समय में पैदावार प्राप्त की जा सकती है आजकल तो बाजार में साल भर मटर को संरक्षित कर बेचा जाता है। और इसको सूखाकर मटर दाल के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। यह फसल पशुओं के लिए चारे के तौर पर भी प्रयोग की जाती है। सब्जी की मटर की खेती के लिए अक्टूबर-नवंबर माह का समय उपयुक्त होता है।



भारत में मटर 7.9 लाख हेक्टेयर भूमि में उगाई जाती है। इसका वार्षिक उत्पादन लगभग 8.3 लाख टन एवं उत्पादकता 1029 किग्रा./हेक्टेयर है। मटर की फसल सामन्यत: 130-150 दिनों में पकती है। इसकी कटाई दरांती से करनी चाहिए तथा इसे लगभग एक हफ्ते तक धूप में सुखाने के बाद बैलों से मड़ाई करनी चाहिए।

मटर की खेती के लिए उपयुक्त भूमि व जलवायु

मटर की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है,लेकिन फिर भी इसके लिए गहरी दोमट मिट्टी (जिसका PH 6-7.5) अधिक उपजाऊ मानी जाती है खरीफ फसल की कटाई के पश्चात एक गहरी जुताई कर पाटा चलाकर उसके बाद दो जुताई कल्टीवेटर या रोटावेटर से करके खेत को समतल और भुरभुरा तैयार कर लेना चाहिए तथा मटर की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए भूमि में जलनिकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए ताकि मृदा में वायु का आवागमन भली-भांति हो सके।

मटर की खेती के लिए 15-30°C तापमान उचित माना जाता है तथा इसकी कटाई के समय 15-20°C तापमान होना चाहिए तथा जहां पर वार्षिक वर्षा 60 से 80 सेंटीमीटर तक होती है वहां पर मटर की फसल सफलतापूर्वक उगा सकते है। अगर मटर के पौधों की वृद्धि के समय वर्षा हो जाती है तो यह पौधों के लिए हानिकारक होती है।

मटर की उन्नतशील प्रजातियाँ

प्रजाति /उत्पादन (कुं / हे.) /पकने की अवधि


कुछ आँय प्रमुख प्रजातियाँ

1. आर्किल

2. बी.एल

3.जवाहर मटर 3 (जे एम 3, अर्ली दिसम्बर)

4.जवाहर मटर - 4 ( जे एम 4)

5.जवाहर पी - 4

6.काशी नंदिनी-

7.काशी अगेती

8.पंत सब्जी मटर

9.पंत सब्जी मटर 5

10.के.पी.एम.आर. 400

मटर की बुआई,बीज-दर और दूरी

बीजों के आकार और बुआई के समय के अनुसार बीज दर अलग-अलग हो सकती है। मटर की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए अक्तूबर के अंत से मध्य नवंबर के बीच बिजाई पूरी कर लेंनी चाहिए । इसके आगे बिजाई में देरी करने से उपज में कमी होगी। बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 80 से लेकर 100 किलोग्राम बीज की जरूतर पड़‍ती है

मटर की बिजाई मशीन से मेंड़ बनाकर करें जोकि 60 सैं.मी. चौड़ी होती हैं तथा बीज को मिट्टी में 2-3 सैं.मी. गहराई पर बोये । और दूरी अगेती किस्मों के लिए 30cm. x 50 cm. और पिछेती किस्मों के लिए 45-60 cmx 10 cm.फासले का प्रयोग करें।

मटर की खेती के लिए उपयुक्त उर्वरक

मटर के लिए मुख्यता: 20kg नाइट्रोजन एवं 60kg. फास्फोरस बुआई के समय देना पर्याप्त होता है। इसके लिए 100-125 kg. डी, ए,पी (डाईअमोनियम फास्फेट) प्रति हेक्टेयर दिया जा सकता है। खादों की पूरी मात्रा कतारों के साथ डाल दें। जिन क्षेत्रों में गंधक की कमी हो वहाँ बुआई के समय गंधक भी डालना चाहिए। यह उचित होगा कि उर्वरक देने से पहले मिट्टी की जांच करा लें और कमी होने पर उपयुक्त पोषक तत्वों को खेत में डालें।

मटर की सिंचाई व खरपतवार नियंत्रण

मटर की सिंचाई के लिए प्रारंभ में मिट्टी में नमी और शीत ऋतु की वर्षा के आधार पर 1-२ सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई फूल आने के समय और दूसरी सिंचाई फलियां बनने के समय करनी चाहिए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हल्की सिंचाई करें और फसल में पानी जमा न हो।अगर खेत में बथुआ, सतपती ,सेंजी, कृष्णनिल,जैसे चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार अधिक हों तो 4-5 लीटर स्टैम्प-30 (पांडीमेथलिन) को 600-800 लीटर पानी में प्रति हेक्टेयर घोलकर बुवाई के तुरंत बाद डालना चाहिए। और इसमे 1-2 गुड़ाई अनिवार्य हैं पहली गोडाई 2-3 पत्ते आने की अवस्था पर या बिजाई के 3-4 सप्ताह बाद की जाती है और दूसरी गोडाई फूल निकलने से पहले की जाती है।

मटर मे लगने वाले रोग व रोकथाम

मटर की फसल में कई प्रकार के रोग लगते हैं। रोगों एवं कीटों की रोकथाम आवश्यक है| जिससे की उत्पादकों को इसकी फसल से इच्छित उपज प्राप्त हो सके। जिनमें से कुछ निम्न हैं-

पत्ती में सुरंग बनाने वाले कीट-इस कीट का आक्रमण पौधे की प्रारंभिक अवस्था में ही शुरू हो जाता है इसमे कीट की सूँडी पत्तियों में सुरंग बनाकर हरे भाग को खाती है। जिससे पत्तियों में अनियमित आकार की सफेद रंग की रेखायें बन जाती है।

रोकथाम-इसके बचाव के लिए 40-50 दिन पुराने 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5kg धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें और 7.5 लीटर गोमूत्र शेष बचने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करलें एवं छानकर फसल में छिड़काव करें |

फली छेदक -यह कीड़ा फूलों और फलियों को 10 से 90 प्रतिशत नुकसान पहुंचाता है। अगर इस कीड़े की रोकथाम जल्दी ना की गयी तो यह फसल को भारी मात्र में नुकसान पहुंचता है

रोकथाम-इसके शुरूआती नुकसान के समय कार्बरिल 900 ग्राम को प्रति 100 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ पर स्प्रे करें। जरूरत: पड़ने पर इसका प्रयोग पुन: कर सकते हैं

माहू-कभी-कभी मांहू भी मटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इस कीट का प्रकोप जनवरी के बाद प्राय: शुरू होता है | यह कीट पौधे का रसचूसने साथ साथ जहरीले तत्व भी छोड़ देते हैं।

रोकथाम-इसके लिए 10 लीटर गोमूत्र तथा इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को डालकर इसे 15 दिनों सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें फिर छिड़काव करें |

सूखा रोग - इसमें पौधे की जड़ें काली हो जाती हैं और बाद में सूख जाती हैं। जिससे पौधा सूख जाता है

रोकथाम-इससे बचाव के लिए बीज को बिजाई से पहले थीरम 3 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी से उपचार कर लेना चाहिए

चांदनी रोग- इस रोग से पौधों पर एक से.मी. व्यास के बड़े-बड़े गोल बादामी और गड्ढे वाले दाग पीजे जाते हैं।

रोकथाम-रोग के लक्षण देखते ही कैराथेन (5 मि. ली.) या वैटेबल सल्फर (20 ग्राम) या बैविस्टीन (5 ग्राम) या वेकार (5 ग्राम) या बैलिटान (5 ग्राम) का 10 लीटर पानी में छिड़काव करें। यदि आवश्यक हो तो 10-15 दिन के बाद पुनः छिड़काव करें।

भूरा रोगा-मटर के पौधों में लगने वाला झुलसा यानी एस्कोकाईटा ब्लाईट रोग कवक की वजह से फैलता हैं. इसमे पत्तों, तनों तथा फलियों पर भूरे रंग के ध्ब्बे बन जाते इस रोग से प्रभावित पौधे शुरुआत में मुरझाने लगते हैं. तथा रोग बढ़ने पर पौधे की जड़ें भूरी पड़ जाती हैं.

रोकथाम- इस रोग से ग्रस्त पौधों के अवशेषों को इकट्ठा करके उन्हे जला दें| और फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देने से पहले लहसुन की गठियों के द्रव्य (2 प्रतिशत) का छिड़काव 7 दिन के अंतराल पर करें| रोग प्रतिरोधी किस्में लगायें|

फ्युजेरियम विल्ट- मटर के इस रोग से ग्रस्त पौधों की निचली पत्तियां पीली पड़ जाती हैं जिससे पौधा बौना हो जाता हैं|और पत्तियाँ किनारे से अंदर को मुड़ जाती हैं

रोकथाम-स्वस्थ बीज का प्रयोग करें बीमारी वाले खेत में केंचुआ खाद तथा सीपीपी को डालें खादें संतुलित मात्रा में भूमि परीक्षण के आधार पर प्रयोग करें।

मटर की कटाई तथा भण्डारण करते समय रखेँ विशेष ध्यान


बिक्री अवस्था में फलियां पूर्णतयः भर जाती है। इसके पश्चात हरा रंग घटने लग जाता है। सामान्यतः 7-10 दिन के अन्तर पर 4-5 बार फलियों की तुड़ाई की जाती है। तथा उसके बाद फसल की कटाईअवस्य कर लें

फसल को पूरी तरह से पकने में लगभग 100-140 दिन का समय लगता है साफ सुथरे खलियान में इसकी मड़ाई करनी चाहिए जब बीज अच्छी तरह सूख जाए और नमी की मात्रा 8 से 10 प्रतिशत तक रह जाए।

तब बीज का भंडारण करना चाहिए और भण्डारण में कीटों से रक्षा के लिए अल्यूमिनियम फास्फाइड की 3 गोली प्रति मीटरी टन की दर से प्रयोग करनी चाहिए। Q&A

Q1 :सब्जी वाली मटर की बुवाई कब की जाती है?

ANS:अक्टूबर-नवंबर माह का समय उपयुक्त होता है।

Q2 :मटर की खेती सबसे ज्यादा कहा होती है?

ANS:मटर उत्पादन सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार राज्यों में होता है मटर ठंडे मौसम की फसल है और महाराष्ट्र में व्यापक रूप से उगाई जाती है.

Q3 :मटर की खेती कितने दिन की होती है?

ANS:कटाई का समय मटर की बुवाई की किस्म पर निर्भर करता है। फसल को पूरी तरह से पकने में लगभग 100-140दिन का समय लगता है

Q4 : मटर में कौन सा खाद देना चाहिए?

ANS: मटर के अच्छे उत्पादन के लिए नाइट्रोजन फासफोरस और डीएपी का उपयोग करना चाहिए।

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